"उषा के द्वार पर — सुबह की डायरी"



सुबह साढ़े चार बजे आँख खुली। करीब साढ़े चार घंटे की नींद के बाद अच्छा लग रहा है। कंपनी क्वार्टर की खिड़की से बाहर का मौसम — बारिश की नमी और थोड़ी-सी ठंडक — इस उषाकाल को ऐसा बना रहे हैं कि सोए रहना मुश्किल है।

कमरे में वामांगी सो रही हैं, और दो कमरों में मेरी दोनों बहनें। बड़ी बहन हाल ही में पंतजलि में रुमेटॉइड आर्थराइटिस के इलाज के लिए आई हैं। यह सोचते-सोचते पाँच मिनट निकल गए और मैं बिस्तर छोड़ चुका हूँ।

इंडक्शन कुकटॉप पर 750 मिली पानी रख दिया है। ब्रश कर रहा हूँ और पूरब का दरवाज़ा खोल चुका हूँ। गरम पानी में काला नमक डालकर दरी पर बैठा, ठंडी हवा के साथ धीरे-धीरे पी रहा हूँ। अब तक पंद्रह मिनट बीत चुके हैं। मन में कोई विचार नहीं था।

पीछे रसोई में एक कप चाय भी उबलने को रख दी थी। इलायची और दालचीनी कप में ही रख दी है ताकि छानने के बाद उसकी खुशबू धीरे-धीरे महसूस हो। इतने में प्राणायाम शुरू कर दिया था, और करीब बारह-तेरह मिनट बाद, यानी पाँच बजे तक, चाय लेकर गैलरी में अपनी कुर्सी पर बैठ चुका हूँ।

पूरब से आती ठंडी हवा में अमरूद और तुलसी की भीनी-भीनी खुशबू है। पहली बारिश नहीं है, तो हवा में शैवाल की गंध भी घुली हुई है। चाय की इलायची की खुशबू और चायपत्ती का स्वाद दोनों आ रहे हैं।

आरामकुर्सी पर बैठा हूँ। बारिश की कुछ बूँदें पैरों पर पड़ रही हैं, और हवा के छींटे चेहरे तक पहुँच रहे हैं। इतनी बारिश है कि भीग रहा हूँ, पर गीला नहीं हूँ। कुल मिलाकर सब कुछ बहुत प्यारी अनुभूति है।

तभी कल रात भोपाल वाले  मित्र (प्रशांत ) का प्रश्न याद आया — ट्रंप और पुतिन की बैठक पर मेरा क्या विचार है?

 सच कहूँ तो मैं समाचार नहीं देखता। वासिली मितरोखिन की Mitrokhin Archives पढ़ने के बाद तो यह और भी पक्का हो गया कि सच हम जैसे लोगों की पहुँच से बहुत दूर है। जो भी समाचार है, सब प्रायोजित और प्रचारित दृष्टिकोण हैं, वही परोसा जा रहा है जो दिखाना है। और जो लोग इन ब्रेकिंग न्यूज़ और राजनीतिक चर्चाओं पर बहस करते हैं, उनके लिए अब मन में असीम सहानुभूति होती है।

यह लिखते-लिखते पौने छह बज चुके हैं। उँगलियाँ कीबोर्ड पर थिरक रही हैं। क्यों लिखा और कैसे लिखा, यह खुद नहीं पता…


अभय - 18 -08 -2025 -5.45 AM


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