मन के ध्रुवतारे को जोहती — एक सुबह की डायरी

रात की दहलीज़ पर, जब दिन की भागदौड़ और उलझनों में लिपटी कोई बेचैन शाम दस्तक देती है,तो रातें मुश्किल लगती हैं।
शायद नई सुबह के इंतज़ार में आशाओं के दीपक तले हम सो जाते हैं,और नींद भी शायद जल्दी ही खुल जाती है।
सुबह के 3:27 बजे हैं और नींद खुल गई है।
बाहर एक नीरव शांति है,हवा शांत है, गैलरी से नीरभ्र आकाश दिख रहा है।थोड़ा पानी पीकर छत पर आ गया हूँ।कहीं दूर कोई झिंगुर मेरे साथ जाग रहा है, एक चमगादड़ भी मेरे ठीक ऊपर से रात की  उलझने लिए सोने जा रहा है l

आज चाँद ग़ायब है और तारे अपनी जादुई चमक बिखेर रहे हैं।पूरब में भोर का तारा—शुक्र—सबसे ज़्यादा चमक रहा है।उसके ठीक ऊपर बृहस्पति, मिथुन की गोद में,थोड़ी मद्धम किंतु स्पष्ट रोशनी बिखेर रहा है।दाईं ओर, उत्तर-पूर्व में कहीं अपने घोड़े पर सवार धनु पूरी गरिमा के साथ दमक रहा है।

इस निर्मेघ आकाश के नीचे मेरे मन का व्योम बादलों से भरा है;और कुछ किंकर्तव्यविमूढ़ता लिए मेरा मन, इसी में कहीं अपना ध्रुवतारा, अपनी दिशा, खोज रहा है।
जितना भी पढ़ूँ, लिखूँ, पूछूँ, जानूँ, समझूँ, सीखूँ, अनुभव जुटाऊँ; बस यही समझ आता है कि अभी स्पष्टता नहीं आई है। स्पष्ट न हो पाने की यही स्पष्टता ही मेरा ध्रुवतारा है,जिसके प्रकाश में मैं कुछ और कदम आगे बढ़ता जाता हूँ।

अब पाँच बज चुके हैं।सब खग-विहग जाग गए हैं और भोर के इस मधुर राग-आलाप के मध्य,इस विनम्र कर देने वाली अनुभूति के साथ मैं एक नया दिन शुरू करता हूँ।
अभय-22-08-2025 

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