हिंदी का वैश्विक विकास : संभावनाएँ और मार्ग



भाषा संवाद का माध्यम मात्र नहीं, बल्कि विचार से व्यवहार, व्यवहार से संस्कार और संस्कारों से संस्कृति की यात्रा का अनवरत पथ है। भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि वह जीवन-धारा है जो व्यक्ति और समाज को जोड़ती है तथा सभ्यता को दिशा देती है।

जहाँ तक हिंदी के वैश्विक विकास का प्रश्न है, यह तभी संभव होगा जब हम इसे भावनात्मक आग्रह से आगे बढ़ाकर व्यावहारिक आवश्यकता, आधुनिक सृजन और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के अनुरूप विकसित करें। इसके लिए कुछ ठोस कदम सहायक हो सकते हैं :

विश्वस्तरीय साहित्य का सृजन- हमें हिंदी साहित्य को उस ऊँचाई तक ले जाना होगा जहाँ वह वैश्विक सम्मान अर्जित कर सके। जैसे गैब्रियल गार्सिया मार्क्वेज़ ने One Hundred Years of Solitude स्पेनिश में लिखकर उसे विश्व साहित्य का रत्न बना दिया, वैसा ही प्रयास हमें हिंदी में करना होगा। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हर वर्ष हिंदी साहित्य से नोबेल पुरस्कार, बुकर पुरस्कार और अन्य वैश्विक सम्मान प्राप्त हों।

हिंदी साहित्य पहले ही अनेक अमर कृतियों से समृद्ध है। जिनमें से कुछ विशेष उल्लेखनीय हैं—

गोदान – प्रेमचंद,गबन – प्रेमचंद,मैला आँचल – फणीश्वरनाथ रेणु,तमस – भीष्म साहनी,गुनाहों का देवता – धर्मवीर भारती,आधा गाँव – राही मासूम रज़ा,कितने पाकिस्तान – कमलेश्वर,राग दरबारी – श्रीलाल शुक्ल,रेत समाधि – गीतांजलि श्री (अंतरराष्ट्रीय बुकर विजेता), कसप -मनोहर श्याम जोशी  और भी कई।  

इन कृतियों ने हिंदी को एक विशिष्ट पहचान दी है। अब आवश्यकता है कि इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य को वैश्विक मंच पर निरंतर नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया जाए।

साहित्यकारों के लिए सशक्त प्रोत्साहन- हिंदी लेखकों और कवियों के लिए प्रोत्साहन और सम्मान का स्तर बढ़ाया जाना चाहिए। साहित्य अकादमी पुरस्कार और अन्य सम्मानों की राशि इतनी हो कि रचनाकार अपनी मूलभूत चिंताओं से मुक्त होकर पूर्ण समर्पण के साथ साहित्य सृजन कर सकें।

कला-सिनेमा को संरक्षण- हिंदी सिनेमा का वैश्विक स्तर पर प्रतिनिधित्व तभी संभव है जब हम व्यावसायिक फिल्मों से इतर कला-सिनेमा को संरक्षण दें। इन्हें कर-मुक्त किया जाए ताकि निर्देशक और लेखक ऐसी फिल्में बना सकें जो ऑस्कर और अन्य अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने में सक्षम हों।

ज्ञान-विज्ञान में हिंदी का प्रयोग-हिंदी का विकास तभी हो सकेगा  जब वह केवल साहित्य या संस्कृति तक सीमित न रहकर विज्ञान, तकनीक और शोध की भाषा बने। हमें लक्ष्य रखना चाहिए कि हमारे सभी पेटेंट और शोध-पत्र हिंदी में भी दर्ज हों। इससे हिंदी का प्रयोग अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक मंचों पर बढ़ेगा।

सरल और व्यवहारिक हिंदी- हिंदी को सरल और व्यावहारिक बनाना समय की आवश्यकता है। इसे सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल माध्यमों पर सहज उपयोग योग्य बनाया जाए। कठिन और अप्रचलित शब्दों की जगह नए, व्यवहारिक और आधुनिक शब्दों को स्वीकार करना होगा।

हिंदी का वैश्विक विकास केवल भावनात्मक आग्रह से संभव नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि हम इसे साहित्य, कला, विज्ञान और संचार के सभी क्षेत्रों में प्रासंगिक, आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाएं। जब हिंदी विश्वस्तरीय कृतियों और आविष्कारों की भाषा बनेगी, तभी उसका वैश्विक विकास वास्तविक अर्थों में साकार होगा।

और अंत में एक बात और स्पष्ट करना चाहूँगा—

“जबकि विदेशी भाषाओं के छिछले ज्ञान को भी शिक्षा का मानदंड मान लिया जाता है, यदि किसी की भाषा समृद्ध हिंदी है तो यक़ीन मानिए, उसे भी विद्वान ही माना जाएगा।”

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