सच कहूं तो वेदांत या भारतीय दर्शन पर कुछ बोलने या लिखने के लिए मैं अपने आप को बड़ा अनुभवहीन और छोटा पाता हूँ, मगर जो कुछ भी थोडा बहुत समझ पाया हूँ , उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि दर्शन का शाब्दिक अर्थ देखना या खोजना है| प्राचीन भारतीय ज्ञान या दर्शन स्वयं और ब्रह्म की खोज और उसके अंतर्संबंध के बोध का साधन है | बात अगर स्वयं के दर्शन की हो तो वेद ,पुराण ,उपनिषद एक दर्पण हैं और जो भी हम इसमें देखेंगे वह सापेक्ष होगा और चूँकि हर व्यक्ति अलग है तो उसका दर्शन भी अलग ही होगा| प्राचीन भारतीय ज्ञान या दर्शन की सभी व्याख्याएं तर्कसंगत, सापेक्ष और एक दुसरे से एकदम पृथक हो सकती हैं लेकिन इसकी एक सार्वभौमिक और पूर्ण व्याख्या नहीं हो सकती| सार्वभौमिक से यहाँ तात्पर्य ऐसी व्याख्या से है जो सबके लिए एक हो और स्थिर हो । वेदांत दर्शन में जड़ता के लिए कोई जगह नहीं है। यह तो बड़ी ही गतिशील ( dynamic) और प्रगतिशील (progressive) विषयवस्तु है | इसी को ऋग्वेद में " एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति " (1.164.46) इसका शाब्दिक अर्थ है "सत्य एक है, ज्ञानी इसे अलग तरह ...
सुबह साढ़े चार बजे आँख खुली। करीब साढ़े चार घंटे की नींद के बाद अच्छा लग रहा है। कंपनी क्वार्टर की खिड़की से बाहर का मौसम — बारिश की नमी और थोड़ी-सी ठंडक — इस उषाकाल को ऐसा बना रहे हैं कि सोए रहना मुश्किल है। कमरे में वामांगी सो रही हैं, और दो कमरों में मेरी दोनों बहनें। बड़ी बहन हाल ही में पंतजलि में रुमेटॉइड आर्थराइटिस के इलाज के लिए आई हैं। यह सोचते-सोचते पाँच मिनट निकल गए और मैं बिस्तर छोड़ चुका हूँ। इंडक्शन कुकटॉप पर 750 मिली पानी रख दिया है। ब्रश कर रहा हूँ और पूरब का दरवाज़ा खोल चुका हूँ। गरम पानी में काला नमक डालकर दरी पर बैठा, ठंडी हवा के साथ धीरे-धीरे पी रहा हूँ। अब तक पंद्रह मिनट बीत चुके हैं। मन में कोई विचार नहीं था। पीछे रसोई में एक कप चाय भी उबलने को रख दी थी। इलायची और दालचीनी कप में ही रख दी है ताकि छानने के बाद उसकी खुशबू धीरे-धीरे महसूस हो। इतने में प्राणायाम शुरू कर दिया था, और करीब बारह-तेरह मिनट बाद, यानी पाँच बजे तक, चाय लेकर गैलरी में अपनी कुर्सी पर बैठ चुका हूँ। पूरब से आती ठंडी हवा में अमरूद और तुलसी की भीनी-भीनी खुशबू है। पहली बारिश नहीं है, तो हवा में शैवाल ...
आगे बढ़ने से पहले एक विनम्र अनुस्मारक। जो कुछ आगे है, वह आपकी मान्यताओं को चुनौती दे सकता है, आपकी स्थापित धारणाओं को झकझोर सकता है, और आपको आपके आरामदायक स्थिति से बाहर खींच सकता है। मेरे प्रिय मित्र ! स्वतंत्रता ; तुम्हारी मुक्ति से बहुत दूर है। ये दोनों ही बिलकुल अलग बातें हैं. हम इस संसार में चलते हैं बंधे हुए— लोहे की जंजीरों से नहीं, बल्कि अदृश्य रस्सियों से, जो हमारी असुरक्षाओं, भय, महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं से बनी हैं। ये शक्तियाँ हमें लगातार चलाती रहती हैं, फिर भी पहिये पर हाथ अदृश्य रहता है— कोई उसे ईश्वर कहता है, कोई ब्रह्मांड, और कुछ, विकास। शायद जिसे हम “स्वयं” कहते हैं, वह केवल भ्रांत धारणाओं से अधिक कुछ नहीं। मुझे सत्य का ज्ञान नहीं। मैं केवल इतना जानता हूँ— हम न तो अपनी मान्यताएँ हैं, न अपने विचार, न अपनी धारणाएँ, और न ही अपनी भावनाएँ। एक मुक्त आत्मा दुर्लभ है— कस्तूरी की गंध सा , विचारों में सब जानते हैं; व्यव्हार में शायद ही कोई ; हवा में एक तरंग-वल्लिका-सी, सभी के कानों तक तो आती है, पर हृदय तक शायद ही कोई ले जा पाता है।
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