कर्ता से द्रष्टा - स्वभावतः भ्रमित मन का अपरिहार्य आत्मावलोकन
जीवन में अक्सर हमारे सामने कुछ ऐसी जिम्मेदारियाँ आ जाती हैं जिन्हें हमें निभाना होता है—चाहे वे परिवार की हों, दैनंदिन कामकाज की हों या हमारे अपने लक्ष्यों और सपनों की। कई बार हम स्वयं भी कुछ जिम्मेदारियाँ आगे बढ़कर स्वीकार कर लेते हैं। परिस्थितियाँ कठिन होती हैं, संसाधन सीमित होते हैं, फिर भी हम किसी तरह उन्हें निभा पाते हैं और कई बार अपेक्षा से बेहतर भी कर जाते हैं। पीछे मुड़कर देखने पर हम अक्सर इसका श्रेय स्वयं को देते हैं— “मैं साहसी था।” “मैं सक्षम था।” “मैंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया।” “मैंने सब संभाल लिया।” लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही था? थोड़ा गहराई से, थोड़ा रुककर विचार करें तो एक दूसरा दृष्टिकोण भी सामने आ सकता है। हमारे आसपास हमेशा हमसे अधिक प्रतिभाशाली, बुद्धिमान, योग्य और संसाधन-संपन्न अनेक लोग रहे हैं। ईश्वर चाहता तो उन्हें हमसे कहीं अधिक सक्षम बनाकर उसी भूमिका के लिए चुन सकता था। फिर हमें ही वह अवसर और जिम्मेदारी क्यों मिली? शायद इसका उत्तर हमारी योग्यता से कहीं बड़ा है। संभव है कि हम बस उस विशेष परिस्थिति में उपस्थित थे, जहाँ जीवन ने हमारे सामने एक जिम्मेदा...