बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी — From layers of perceived realities to conciousness.
कुछ अवस्थाएँ ऐसी होती हैं जो हमारे चेतन और अवचेतन मन के बीच कहीं ठहर जाती हैं। वे न पूरी तरह जाग्रत अनुभव जैसी होती हैं, न स्वप्न जैसी। कई बार हमारे कुछ चेतन अनुभव ऐसे लगते हैं जैसे वे किसी पहले से अनुभूत, अवचेतन अनुभव या स्वप्न की पुनरावृत्ति हों। कोई इसे sixth sense कहता है, कोई intuition , कोई insight , कोई déjà vu —और शायद इनके लिए मेरे पास अभी भी कोई अंतिम शब्द नहीं है। लेकिन उन क्षणों में एक विचित्र अनुभव अवश्य होता है। हम या तो उलझन में पड़ जाते हैं, या अचानक यह देखने लगते हैं कि जीवन स्वयं एक स्वप्न जैसा है और स्वप्न भी, चेतना के अपने स्तर पर, एक वास्तविक अनुभव है। ये विचार पिछले कुछ दिनों में मेरी सहधर्मिणी के फूफेरे भाई, शुभम , के साथ हुई दो-तीन रातों की चर्चाओं का विस्तार मात्र है। हमारी बातचीत समय, स्थान, चेतना, स्वप्न और अनुभूति की सीमाओं तक चली गई। इन्हीं चर्चाओं के दौरान शुभम ने मुझे Interstellar देखने का सुझाव दिया। मैंने वह फिल्म देखी और उसके बाद Christopher Nolan की Inception भी देखी। दोनों फिल्मों ने मेरे ...