तुम हिमालय ही हो, न ?
निशा का द्वितीय प्रहर है । टेबल लैम्प की पीली रोशनी में करीब दस बजे कुछ लिखने बैठा हूँ। सच कहूँ तो अपने एकांत में आपसे कुछ कहने बैठा हूँ। नेपथ्य में रात के दूसरे ही प्रहर का राग राग दरबारी कान्हड़ा A स्केल 440 Hz से थोड़ा नीचे 432 Hz पर सितार, तानपुरे और बांसुरी के साथ बज रहा है।
शास्त्रीय संगीत में मेरी रुचि करीब पच्चीस वर्षों से है, या कहूँ कक्षा 6 से। मगर विकिपीडिया की मदद से ही बता सकता हूँ कि इस राग का थाट आसावरी है, स्वर गंधार, निषाद और धैवत कोमल हैं, शेष शुद्ध स्वरों का प्रयोग होता है। जाति सम्पूर्ण षाडव है, अर्थात आरोह में सातों स्वर और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग। वादी स्वर ऋषभ रे है और सम्वादी स्वर पंचम प है। यह सब बिल्कुल वैसा है जैसे किसी को खाने के स्वाद की तो समझ बहुत हो, मगर पकाने की न हो।
यह राग आपको भी अच्छा लग सकता है, दरबारी का स्वभाव गंभीर है, गहन है, राजसी है, मानो भीतर का अँधेरा भी गरिमा से भरा हो मानो आप कोई राजा या रानी हों और अपने भवन में एकांत में टहल रहे हों। खैर, यह तो हुई माहौल की बात। अब करते हैं, बात की बात ।
यदि आप मानते हैं कि आत्मा अमर है, तो आत्मा के स्तर पर संवाद करते हुए समय और वय(उम्र) के दायरे स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यहाँ से आगे यदि तुम इस संवाद में एक दूसरी आत्मा के रूप में बढ़ रहे हो, तो मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि मैं तुम्हें जानता हूँ, तुम्हारे तल, नितल, समतल, अतल और तलातल तक। मगर केवल एक कोना। शेष पूर्ण तुम या मैं भी स्वयं के लिए आजन्म खोज का विषय रहेंगे। तुम्हें यह अतिशयोक्ति, आडंबर या अहंकार लग सकता है, मगर यह अपेक्षित है। चलो, इस यात्रा में थोड़ा आगे बढ़ते हैं।
तुम पर्वत हो और पर्वतों में भी हिमालय। ये जो हिमनद या ग्लेशियर हैं, ये तुम्हारे कंधों का बोझ हैं, तुम्हारी पीड़ा हैं, जिन्हें तुमने अपने हृदय से, छाती के पत्थर की तरह, चिपका रखा है। तुमने इन्हें युगों से संजोए रखा है। जब जब तुमने इन्हें अपनी निजता के दायरे से बाहर निकाला है, वह हिमनद पिघला है और जीवनदायिनी गंगा निकली है, जिसने तुम्हें उतना ही खाली और हल्का किया है जितना उसने उन सबको भर दिया है जिन्हें भी उसने छुआ है।
कभी सोचा है तुमने। जो हमें बाँधता है, वही हमें मुक्त भी करता है। और जो हमें मुक्त करता है, वही हमें बाँधता भी है। क्योंकि बंधन और मुक्ति अनुभूति से पहले दृष्टि की विषयवस्तु हैं। जीवन न तो पूर्ण बंधन है, न पूर्ण मुक्ति। वह तो इन दो चरम सीमाओं के मध्य चेतना का सतत स्पंदन है, मन का एक अनवरत आवर्तन।
दुःख को यदि हल्के स्पर्श से थामा जाए तो वह सेतु बन जाता है। और यदि उसे मुट्ठी में जकड़ लिया जाए तो वही कारागार हो उठता है। तुम्हारी पीड़ा का चेहरा निजी है, पर उसकी धड़कन सार्वभौमिक। उसकी अनुभूति तुम्हारी हो सकती है, पर उसका सार समस्त मानवता का है। घाव अंतरंग और नवीन प्रतीत होता है, किन्तु उसकी पीड़ा चिरकाल से सार्वभौमिक है। हर हृदय किसी न किसी क्षण ऐसे ही काँपा है।
जब हम दुःख को एक सहज, साझा मानवीय अनुभूति के रूप में पहचानते हैं, वेदना को केवल अपनी या निजता के स्तर से थोड़ा ऊपर उठाकर, तो वेदना संवेदना बन जाती है। तब करुणा प्रवाहित होती है, न दया के रूप में, न किसी ऊँचाई के अहंकार से, बल्कि एक शांत, स्वाभाविक, आत्मीयता प्रवाह में। और यह करुणा स्वयं से आरम्भ होती है, स्वयं से जैसे गंगा हिमालय से। हुए न तुम हिमालय अब ?
जैसे गंगा का प्रवाह हिमालय से जगत की ओर है, वैसे ही करुणा का प्रवाह भीतर से बाहर का है, व्यक्ति से अनंत की ओर।
जब दुःख को कोमलता से स्वीकार लिया जाता है, तो वह न्याय की माँग करना छोड़ देता है। अस्वीकृति और पृथकता का भाव जाता रहता है।
जिस आकाश तले हम विलाप कर रहे होते हैं, उसी आकाश के नीचे असंख्य हृदय रो चुके हैं। इस बोध में बंधन की सलाखें स्वतः ढीली पड़ जाती हैं। जब मानव हृदय का स्थिर और पाषाण सा हिमनद पिघलता है, तो करुणा की एक कोमल धारा संसार में प्रवाहित होने लगती है।
खुद को खाली करना ही तुम्हें भर देता है। और स्वयं को केवल निज से भर लेना तुम्हें रिक्त ही कर देता है।
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