"जब स्वर्ग के देवता राख हो गए -1"

"यह निबंध आस्था पर आक्रमण नहीं, बल्कि उसकी अंतःयात्रा का दार्शनिक अन्वेषण है।
यह नैतिक प्रतिरोध के घनत्व से आरम्भ होकर अस्तित्व के आध्यात्मिक विलय की भारहीनता में प्रवेश करता है।
इसे शीघ्रता में नहीं, सजगता में पढ़ें।"

यदि बुराई है, और शैतान भी है, और यदि ईश्वर है, तो बुराई उसकी इच्छा से बाहर नहीं हो सकती, क्योंकि कुछ भी उसकी इच्छा से बाहर नहीं हो सकता।
यदि ऐसा है, तो उद्देश्य और तर्क की दृष्टि से, और बिना किसी पाखंड के, मैं मनुष्य को नैतिक साहस में ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानता हूँ। क्योंकि मनुष्य, अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं के बावजूद, अपने भीतर के शैतान से जूझता है और बाहरी अंधकार का प्रतिरोध करता है।
यह मेरा विद्रोह नहीं है। यह नैतिक जिज्ञासा है, उस प्रश्न को दबाने से इनकार जो केवल इसलिए असुविधाजनक बना दिया गया है क्योंकि यह समाज और हमारी परंपरा ऐसे प्रश्नों की अनुपस्थिति में सहज हो चुकी है। यह उस अंधी स्वीकृति का भी निषेध है, जो हमें अंधविश्वास के पिंजरे का तोता बना देता है।
जीवन में अनुभव के धरातल पर यह विचार या द्वंद्व सहज अनुभूत हो सकता है। परंतु इसे स्वीकार करना कठिन है, क्योंकि सदियों की सामाजिक संस्थागत व्यवस्था ने हमें यह सिखा दिया है कि कुछ प्रश्न असम्मानजनक हैं, या श्रद्धा तर्क की कसौटी के परे है, जबकि वे वस्तुतः अत्यंत ईमानदार प्रश्न होते हैं , ऐसी आस्थाएं व्यक्तिनिष्ठ या सामाजिक मान्यताएं मात्र हैं,  या थोड़ा गहरे में बस हमारा मिथ्याभिमान।


पर ठहरिए।


यदि यह विचार आपको असहज करता है, तो शायद यह आमंत्रण  है कि आप उस चेतना-स्तर से थोड़ा ऊपर उठें, जहाँ से यह प्रश्न पूछा जा रहा है।
जैसे ही हम ईश्वर को एक पृथक, बाहरी सत्ता के रूप में देखना शुरू करते हैं, जो हमारी अपनी चेतना से अलग कहीं कल्पित स्वर्गों में विराजमान है, वह अवधारणा  अधोलिखित द्वंद्व के आलोक में धीरे-धीरे ढहने लगती है और तब जो शेष बचता है वह कोई दूरस्थ स्वर्ग नहीं, बल्कि अंतस्थ चेतना है,  जिसमें अज्ञान और चैतन्य दोनों घटित होते हैं।
जब यह समझ में आता है कि जिसे हम ब्रह्म या ईश्वर कहते हैं, वह हमारी अपनी चेतना की ही एक उच्चतर अभिव्यक्ति है, तब पूर्व की नैतिक तुलना स्वतः समाप्त हो जाती है। मनुष्य ईश्वर से श्रेष्ठ है या नहीं, यह प्रश्न ही निरर्थक हो जाता है, क्योंकि तुलना द्वैत पर आधारित होती है, और जहाँ द्वैत नहीं, वहाँ तुलना भी नहीं।
उस बिंदु पर श्रेष्ठता और हीनता की भाषा अनुपयुक्त प्रतीत होती है। विभिन्न प्राणी, विभिन्न जीवन-रूप, आत्म-जागरूकता की भिन्न-भिन्न गहराइयों पर कार्य करते हैं। वे किसी परम नैतिक श्रेणी में नहीं आते, वे केवल उतनी ही चेतना के स्तर से संचालित होते हैं, जितनी उन्हें उपलब्ध है।
जो प्रारंभ में ईश्वर पर आरोप जैसा प्रतीत हुआ था, वह अंततः दृष्टिकोण का परिवर्तन बन जाता है। जो ईश्वर राख हुआ, वह बाहरी, मानवीकृत अवधारणा थी।
और अब जो शेष बचता है, वही चेतना है।
यह वेदांत, विशेषतः अद्वैत, की शांत परिणति है , जहाँ साधक और साध्य दो नहीं रहते, जहाँ नैतिक तुलना का रणक्षेत्र पहचान की निस्तब्धता में विलीन हो जाता है।

स्वर्ग के देवता राख हो गए।
चेतना शेष रही।
अब देखना यह है कि जब स्वयं चेतना भी राख हो जाए, तो क्या शेष रहेगा।.......

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