अपूर्ण में पूर्ण

अनिश्चितता और अधूरेपन के भीतर अक्सर वही बीज छुपा होता है, जिसे हम संभावना कहते हैं—कुछ वैसा ही, जैसा स्वयं जीवन है। जो कुछ भी पहले से तय और पूर्ण मान लिया जाता है, वहाँ आगे बढ़ने की गुंजाइश लगभग शून्य हो जाती है। हार अपने भीतर नए द्वार समेटे रहती है, जबकि जीत के साथ कहीं न कहीं अहंकार की एक मौन छाया भी चल पड़ती है। खुशियाँ और विजय जितनी सहजता से सार्वजनिक हो जाती हैं, दुःख और पराजय उतनी ही खामोशी से निजी रह जाती हैं।
कर्म की अपनी-अपनी व्याख्याएँ हो सकती हैं, पर अधूरेपन, संघर्ष और ठहराव को स्वीकार करना भी एक सचेत वरण है—इसलिए नहीं कि मृत्यु का भय नहीं, बल्कि इसलिए कि संभावनाओं की साधना ही जीवन का सबसे आत्मीय चयन है। यहाँ प्रयास बना रहता है, बस परिणाम के आग्रह की आवाज़ धीमी पड़ जाती है।

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