रात के अफ़साने: निःशब्द के शब्द
रात के बारह बजकर दस मिनट हुए हैं। मन के कुछ-कुछ भाव और विचार, जो एक मित्र से बातचीत के दौरान अनायास ही अंतरात्मा से उठकर मन और वागेन्द्रियों तक चले आए थे, उन्हें सँभालने, पिरोने और उकेरने की कोशिश में उँगलियाँ की-बोर्ड पर थिरक रही हैं।
लैपटॉप पर यूट्यूब का प्रीमियम सब्सक्रिप्शन खुला है, नेपथ्य में हिंदुस्तानी वाद्य-संगीत का चैनल। सितार, बांसुरी और तबले की स्वर-लहरियाँ मेरे डेस्कटॉप स्टूडियो स्पीकर्स से हवा में तैरती हुई कर्णपटल पर नाद करती हुई मन को ऐसा सुकून देती हैं, मानो वे कोई गीत सिर्फ मुझे ही सुना रही हों।
इन सुरों में रात के दूसरे और तीसरे प्रहर के राग-आसावरी, काफी, भैरवी और टोड़ी, के कोमल गांधार और कोमल निषाद ने ऐसा शमा बाँधा है कि लगता है जैसे सारे कालजयी नृत्य-संगीत प्रेमी गंधर्व इस निशा-काल में मेरी लेखनी के साक्षी बन बैठे हों।
और तभी मन में एक अजीब-सा दबाव घिर आता है,जैसे कोई मंच-भय हो, कोई अदृश्य प्रदर्शन का बोझ। लेकिन उसी क्षण एक विश्वास भी जग उठता है, मानो ये सुर और राग ही मेरे साथी, मेरे गुरु और मेरे मार्गदर्शक हों।
फिर भी लेखक को दुविधा बनी रहती है; ख़ासकर तब, जब यह अनुभव होता है कि अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है। मेरे पास केवल मेरे सहज अनुभव और अनुभूतियाँ हैं,एक साधारण से इंसान की अत्यंत साधारण अनुभूतियाँ, जिन्हें मैं यूँ ही लिखता जा रहा हूँ। शायद कभी इस तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में, जहाँ स्मार्ट मशीनों से घिरा आदमी साधारण बनने की चाह में कुछ ढूँढता हुआ लौटे, तो उसे यहाँ एक नज़र, एक नज़रिया या एक धीमी-सी अनुभूति का स्पर्श मिल जाए, जो उसकी अपनी दृष्टि को पुनर्जीवित कर दे।
अज्ञान की इसी अनुभूति में यह भी महसूस करता हूँ कि कोई न कोई मेरे इन संसमरणों पर अपना समय खर्च करेगा और वह समय व्यर्थ न जाए, मन के किसी कोने में यही जिम्मेदारी कहीं ठिठकी-सी रहती है, शायद मेरी लेखनी में ।
कल कम्पनी द्वारा आयोजित योग कक्षाओं में, फ़ोन साइलेंट मोड पर होने के कारण प्रशांत का कॉल मिस हो गया था। घर आते ही उससे बात हुई। जब उसने योग कक्षाओं में जाने के बारे में पूछा, तो मैंने सहज ही कह दिया—
"कुछ दिन किताबों के बजाय अनुभव और अनुभूतियों पर ध्यान देना चाहता हूँ। आखिर कुछ ज्ञान तो किताबों के बाहर, अनुभवों में भी घटित होता होगा न?"
मित्र का उत्तर सीधा-सादा था -
"कुछ नहीं, सबकुछ अनुभव में ही घटेगा।"
उसके इस एक वाक्य ने मन में जैसे एक कौंध भर दी। हाँ, वास्तव में ज्ञान तो केवल अनुभव और अनुभूतियों में ही घटता है; इसके अलावा जो भी है, वह मात्र डेटा और सूचना है।
बात बड़ी साधारण थी, पर इस "सबकुछ" शब्द ने कथन के अर्थ और उसकी गहराई को अचानक कई गुना बढ़ा दिया।
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