एक जीवन में अनेक जीवन.

जीवन कई बार Godaan की तरह कंधों पर रखा हुआ वह भार है, जिसे उतारना संभव नहीं, केवल उठाना या यूं कहें कि निभाना संभव है। कभी मन के भीतरी Diwar me ek khidki rahti hai जिससे कोई  कामना चुपचाप दस्तक देती है,जैसे Gaban में लालसा धीरे-धीरे चरित्र को खा जाती है। बाहर दुनिया अपनी चाल-ढ़ाल  से चलती रहती है, Raag Darbari की विडम्बनाओं से भरी, Maila Anchal की धूल से सनी, और कभीकभी Tamas के अँधेरे से ढकी हुई। इतिहास झकझोरता है, जैसे Jhutha Sach और तब समझ में आता है कि सत्य हमेशा सांत्वना नहीं देता, वह कई बार भीतर की शांति भी छीन लेता है जैसे Ek chithda sukh के लिए किसी Manchale ka Sauda हो|

फिर भी मनुष्य के पास एक जगह बची रहती है,भीतर की वह निःशब्द भूमि, जहाँ अपमान और सम्मान बराबर बैठते हैं। जैसे Rashmirathi का कर्ण अपने भाग्य से लड़ते हुए भी टूटता नहीं, और Kamayani का मनु प्रलय के बाद भी विचार करना नहीं छोड़ता। जीवन प्रश्न पूछेगा, Chitralekha की तरह,पाप क्या है, पुण्य क्या है; और उत्तर हमेशा स्पष्ट नहीं होंगे। प्रेम हमें तपाएगा, जैसे Gunahon Ka Devta में; आत्मा स्वयं को टटोलेगी, द्वंद्व होंगे जैसे Shekhar Ek Jeevani में। स्मृतियाँ मन के द्वार पर कभी आहट तो कभी दस्तक देंगी Ve Din की तरह,धीरे, चुपचाप, पर गहरी।

कभी समाज का शोर इतना बढ़ जाएगा कि वह Mahabhoj की भीड़ जैसा लगेगा; कभी पहचान और सीमाएँ Kitne Pakistan की तरह हमें बाँटने लगेंगी। तब समझ में आता है कि बाहर की व्यवस्था हमारे नियंत्रण में नहीं, पर भीतर की दिशा अभी भी हमारे हाथ में है। कर्म करते रहना,जैसे Karmabhoomi सिखाती है,पर परिणाम से चिपककर नहीं।

और जब जीवन अपनी कठोरता दिखाता है, Joothan की तरह कड़वा, या Murdahiya की तरह संघर्षपूर्ण, तब भीतर एक शांत स्वीकृति जन्म ले सकती है। यह स्वीकृति हार नहीं है; यह वह परिपक्वता है जो कहती है: “हाँ, यह भी जीवन है।” जब समय Andha Yug जैसा अंधकार रच दे, तब भी मन के कोने में एक दीप बचा रहता है।

अंततः जीवन एक लंबी कथा है,Zindaginama की तरह विस्तृत और बहुस्तरीय। इसमें आँसू भी हैं, हँसी भी; विफलता भी है, उपलब्धि भी। जो व्यक्ति हर उतारचढ़ाव को अंतिम सत्य मानकर नहीं, बल्कि एक गुजरते दृश्य की तरह देख पाता है, वही भीतर से हल्का हो पाता है। संतोष तब कोई उपदेश नहीं रहता, वह थके हुए मन के लिए आश्रय बन जाता है।

जब हम स्वीकार कर लेते हैं कि जीवन के Mahasamar me सब कुछ हमारे अनुसार नहीं होगा, तब पहली बार Siddharth सी शांति संभव होती है। जब हम अपने हिस्से का कर्म पूरी निष्ठा से कर लेते हैं और शेष को समय पर छोड़ देते हैं, तब भीतर एक गहरा सन्नाटा उतरता है, अडिग, कोमल और स्थायी। शायद यही वह बिंदु है जहाँ मनुष्य बाहर की अशांति के बीच भी भीतर से अचल रह सकता है; जहाँ जीवन की समूची कथा हमें झकझोरती  है एक kudhan भी होती है, परन्तु Kunti के जैसे जीवन का क्यों जान या मान लेने के बाद हम इसके क्या और कैसे को आखिरकार ढूंढ ही लेते हैं। और अब तक Volga se Gsnga tak सी इस यात्रा में हमारा मैं अब Nyuntam Main रह जाता है | हम अब देख पाते हैं कि ek Poorv me kitne poorv होते हैं और एक राह में kitne Chaurahe जिनसे गुज़रते हुए हम अपना-अपना Aanandmath ढूँढा करते हैं |

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