स्वर्ग या नरक ( वर्त्तमान समय में स्वर्ग और नर्क की अवधारणा की प्रासंगिकता)
एक मित्र का बड़ा ही सहज किन्तु गंभीर एवं प्रश्न प्राप्त हुआ है, प्रश्न है मुझे जन्नत मिलेगी या दोज़ख ? यह प्रश्न एक न एक बार हम सब के मन में जरूर आया होगा मगर एक निश्चित जबाब शायद ही मिला हो हमें कभी ! इस विषय पर कुछ बोलने या लिखने के लिए सामान्य अवधारणा के स्वर्ग या नर्क दोनों जगहों का मेरा व्यक्तिगत अनुभव शुन्य है मगर वैदिक धर्म ,ईसाई धर्म,इस्लाम,गुरुग्रंथ साहब,बौद्ध धर्म और जैन धर्म के सभी धर्म ग्रंथो की जो भी थोड़ी बहुत मेरी समझ है ( यहाँ समझ से मेरा मतलब अन्धविश्वास या आस्था नहीं ,बल्कि तर्कसम्मत विचारों से है ) उसके आधार पर मेरे पास एक सार्वभौमिक निश्चित और सरल उत्तर है इस प्रश्न का, जो किसी भी वर्ग, सम्प्रदाय ,देशकाल( किसी काल विशेष में देश या समाज की दशा ) परिस्थिति में सीमित नहीं हैं। लिखने को तो इस विषय पर एक पर कई ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं मगर हम इसको थोड़ा सरल और सुग्राह्य रखने की कोशिश करते हैं। इस विषय का विचार हम आस्तिक और नास्तिक दोनो...