मृत्यु से बड़ा दुःख, अधूरा जीवन —जीवन से बड़ा सुख पूर्ण मृत्यु l


एक कली के भीतर एक फूल छिपा होता है—
जैसे कोई अनकही बात,
जो अभी शब्दों तक नहीं पहुँची।

लेकिन उसका जीवन केवल फूल बन जाने की यात्रा नहीं है।

उसके भीतर एक संभावना है—
एक ऐसा रूप, जो अभी अस्तित्व में नहीं आया।
एक ऐसी सुगंध, जो अभी किसी ने महसूस नहीं की।शायद कली की सबसे बड़ी पीड़ा खिल न पाने की नहीं, अपने भीतर छिपी संभावना को अधूरा छोड़ देने की है।

लेकिन फूल का खिलना भी अंतिम उद्देश्य नहीं है।फूल का सौंदर्य केवल उसके होने में नहीं,

उसके देने में है। वह अपनी सुगंध अपने पास नहीं रख सकता। खिलते ही वह स्वयं से बाहर जाने लगता है। जो उसके भीतर था, वह धीरे-धीरे संसार का हो जाता है। शायद मनुष्य का जीवन भी इसी रहस्य को समझने की यात्रा है।

हम अपने भीतर बहुत कुछ लेकर आते हैं—
क्षमता, संवेदना, विचार, अनुभव, सृजन और प्रेम।

जीवन का एक हिस्सा हमें यह समझने में लगता है कि हम क्या बन सकते हैं।

और दूसरा, शायद उससे भी अधिक महत्वपूर्ण,
यह समझने में कि जो हम बन सकते हैं, उससे किसी और को क्या मिल सकता है।

क्योंकि केवल अपनी क्षमता तक पहुँच जाना भी शायद पूर्णता नहीं है। एक व्यक्ति बहुत कुछ बन सकता है, बहुत कुछ जान सकता है, बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है,लेकिन यदि उसके होने से उससे आगे किसी जीवन में कुछ जन्म ही न ले, तो शायद उसके भीतर कुछ अनकहा रह जाता है।

शायद जीवन की सबसे गहरी पीड़ा असफल होने की नहीं है।वह यह जानना है किहमारे भीतर कुछ था जो किसी और के जीवन को छू सकता था,

लेकिन हम उसे अपने भीतर से बाहर ही नहीं ला पाए।एक विचार था, जो जन्म नहीं ले सका।

एक प्रेम था, जो दिया नहीं जा सका। एक क्षमता थी,जिसका संसार को लाभ नहीं मिला। एक खुशबू थी, जो फूल के साथ ही समाप्त हो गई।

शायद इसलिए जीवन का अर्थ अपने भीतर छिपे फूल को खोज लेना भर नहीं है।उसे इतना विकसित करना है कि वह खिले,और इतना देना है कि उसकी सुगंध हमारे बाद भी कहीं ठहरी रहे। क्योंकि शायद अंत मेंहम अपने साथ यह नहीं ले जाते कि हम कितने बड़े बने थे, हमने कितना पाया,] या कितने लोगों ने हमें जाना था।

शायद भीतर कहीं बस यही प्रश्न रह जाता है—

जो कुछ मुझे मिला था,
क्या मैं उसे आगे दे पाया?

क्या मेरे होने से, किसी और की राह थोड़ी उजली हुई? क्या मेरी उपस्थिति से किसी ने अपने भीतर कुछ महसूस किया, जो पहले वहाँ सोया हुआ था? या मैं अपने भीतर की सारी खुशबू लेकर ही चला गया? शायद मृत्यु वह नहीं ,जब फूल मुरझा जाता है। वह है, जब फूल खिल सकता था, उसमें खुशबू थी, और फिर भी वह किसी तक पहुँच न सकी।

और शायद  जीवन भी ऐसा ही है, जिसमें अंत के क्षणों में हमें यह पछतावा न हो कि
हम क्या बन सकते थे, बल्कि एक शांत-सी तृप्ति हो कि, जो कुछ हमारे भीतर था, हमने उसे अपना बनाकर नहीं रखा। हमने उसे जिया, उसे खिलाया, और फिर उसे संसार को दे दिया। तब शायद फूल केवल खिलता नहीं। वह अपने खिलने का अर्थ पा लेता है।


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