बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी — From layers of perceived realities to conciousness.


 कुछ अवस्थाएँ ऐसी होती हैं जो हमारे चेतन और अवचेतन मन के बीच कहीं ठहर जाती हैं। वे न पूरी तरह जाग्रत अनुभव जैसी होती हैं, न स्वप्न जैसी। कई बार हमारे कुछ चेतन अनुभव ऐसे लगते हैं जैसे वे किसी पहले से अनुभूत, अवचेतन अनुभव या स्वप्न की पुनरावृत्ति हों। कोई इसे sixth sense कहता है, कोई intuition, कोई insight, कोई déjà vu—और शायद इनके लिए मेरे   पास अभी भी कोई अंतिम शब्द  नहीं है।

लेकिन उन क्षणों में एक विचित्र अनुभव अवश्य होता है। हम या तो उलझन में पड़ जाते हैं, या अचानक यह देखने लगते हैं कि जीवन स्वयं एक स्वप्न जैसा है और स्वप्न भी, चेतना के अपने स्तर पर, एक वास्तविक अनुभव है। ये  विचार पिछले कुछ दिनों में मेरी सहधर्मिणी के फूफेरे भाई,  शुभम, के साथ हुई दो-तीन रातों की चर्चाओं का विस्तार मात्र है। हमारी बातचीत समय, स्थान, चेतना, स्वप्न और अनुभूति की सीमाओं तक चली गई। इन्हीं चर्चाओं के दौरान शुभम ने मुझे Interstellar देखने का सुझाव दिया। मैंने वह फिल्म देखी और उसके बाद Christopher Nolan की Inception भी देखी।

दोनों फिल्मों ने मेरे प्रश्न को और गहरा कर दिया।

हम जिस time-space में जी रहे हैं, वही हमें सम्पूर्ण reality दिखाई देती है। हमारे सामने कुछ और भी हो सकता है, लेकिन उसकी पूरी अनुभूति हमारी वर्तमान चेतन अवस्था के लिए उपलब्ध न हो।हो सकता है कि हमारी चेतना के अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग अनुभव उपलब्ध हों, जाग्रत अवस्था में कुछ, स्वप्न में कुछ और, और अवचेतन की गहराइयों में कुछ और। इस अर्थ में प्रत्येक व्यक्ति अपनी अनुभूत reality में जीवन जीता है।

यहीं से एक संभावना जन्म लेती है, क्या असंख्य अनुभव, असंख्य जीवन और असंख्य जगत अपने-अपने स्तर पर एक साथ प्रकट हो सकते हैं? यह कोई वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि चेतना और अनुभव को समझने की एक छोटी कोशिश  है। शायद हम समय, स्थान और अनुभूति की अनेक परतों के बीच जी रहे हैं। शायद हमारी वर्तमान चेतना केवल उस reality का एक सीमित window है, जो हमें इस समय उपलब्ध है।और यदि ऐसा है, तो प्रश्न उठता है, क्या हम reality में स्थित  हैं, या अपनी अनुभूत reality या perception  में ? 

स्वप्न और जाग्रत जीवन,स्वप्न में हम एक संसार देखते हैं। उसमें समय होता है, स्थान होता है, लोग होते हैं, घटनाएँ होती हैं और भावनाएँ भी बिल्कुल वास्तविक लगती हैं।स्वप्न के भीतर रहते हुए हमें सामान्यतः यह अनुभव नहीं होता कि यह स्वप्न है। लेकिन यदि स्वप्न में चेतना स्वयं को एक संसार के रूप में अनुभव कर सकती है, तो क्या जाग्रत जीवन के बारे में भी यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि हम जिस संसार को पूर्ण और स्वतंत्र reality मानते हैं, वह भी चेतना में प्रकट अनुभव का एक स्तर है?

यहाँ हमें सावधान रहना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि भौतिक संसार “है ही नहीं” या विज्ञान ने उसे भ्रम सिद्ध कर दिया है। प्रश्न इससे अधिक सूक्ष्म है,हम जिस संसार को जानते हैं, वह हमेशा अनुभव किए गए संसार के रूप में ही हमारे सामने आता है। Reality और उसका अनुभूति  एक ही बात नहीं हैं।

आश्चर्य यह है कि जिन प्रश्नों को आधुनिक cinema और contemporary philosophy के माध्यम से हम आज देख रहे हैं, उनसे मिलते-जुलते विचार भारतीय प्राचीन साहित्य में बहुत पहले से दिखाई देते हैं।

योगवासिष्ठ (बृहत् रामायण)  में अनेक जगतों और अलग-अलग अनुभव-क्षेत्रों की चर्चा मिलती है।

निर्वाणप्रकरण, सर्ग 144 में कहा गया है—

यथेदं नो जगत्तद्वच्छतानां खे शतानि हि ।
नृणां पश्यन्तु तेषां तु नान्योन्यमनुभूतयः ॥ ६ ॥

यथा इदम् नः जगत्, तद्वत् शतानाम् खे शतानि हि।
नृणाम् पश्यन्तु, तेषाम् तु न अन्योन्यम् अनुभूतयः।॥ ६ ॥

जैसे हम अपनी दुनिया को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, वैसे ही अनगिनत अन्य जगत अपने-अपने अनुभवों के साथ हो सकते हैं। लेकिन उन जगतों के अनुभव एक-दूसरे के लिए प्रत्यक्ष या परस्पर अनुभूत नहीं होते

यह विचार आधुनिक “parallel realities” की वैज्ञानिक स्थापना नहीं है। लेकिन दार्शनिक स्तर पर यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य उठाता है, क्या एक reality का होना इस बात की गारंटी है कि वही सम्पूर्ण reality है? 

योगवासिष्ठ, निर्वाणप्रकरण, सर्ग 176 में राम पूछते हैं—

जगन्ति सन्ति असंख्यानि, भविष्यन्ति गतानि च। 

तत् कथाभिः कथम् ब्रह्मन् प्रबोधयसि माम् इमम्॥ १ ॥

 राम कहते हैं—

यदि अनगिनत जगत हैं, हो चुके हैं और भविष्य में होंगे, तो उन सबकी कथाओं के माध्यम से आप मुझे कैसे प्रबोधित कर रहे हैं?

और वसिष्ठ कहते हैं—

 स्वप्ने चित्-मात्रम् एव आद्यम्, स्वयम् भाति जगत्-तया।

 यथा तथा एव सर्ग-आदौ, न अत्र अन्यत् उपपद्यते। ५ ॥

अणौ अणौ असंख्यानि, तेन सन्ति जगन्ति खे।

तेषाम् तान् व्यवहार-ओघान् संख्यातुम् कः इव क्षमः।

 जिस प्रकार स्वप्न में मूलतः केवल चेतना ही स्वयं को जगत के रूप में प्रकाशित करती है, उसी प्रकार सृष्टि के आरम्भ में भी चेतना ही स्वयं को जगत के रूप में प्रकट करती है। श्लोक का संकेत यह है कि जगत की प्रतीति के पीछे चेतना को मूल आधार के रूप में देखा जा सकता है।

अणु-अणु में भी असंख्य जगतों की कल्पना की गई है। उनके भीतर होने वाले अनगिनत व्यवहारों और घटनाओं की पूरी गणना कर पाना किसके लिए संभव है?

Time और Space भी अनुभव की संरचना का हिस्सा हैं, योगवासिष्ठ, उत्पत्तिप्रकरण, सर्ग 21.2 में कहा गया है—

दिक्-काल-कलना-आकाश-धर्म-कर्म-मयानि च।

परिस्फुरन्ति अनन्तानि, कल्पान्त-स्थैर्यवन्ति च।

अर्थात् जगत केवल वस्तुओं का संग्रह नहीं है। जिस reality को हम अनुभव करते हैं, वह दिशा, समय, आकाश, अवधारणा, नियम और कर्म जैसी अनेक संरचनाओं के भीतर प्रकट होती है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि हम केवल किसी “बाहरी संसार” में नहीं रहते। हम एक विशेष काल-देश-चेतना-व्यवस्था में संसार का अनुभव करते हैं।और यदि अनुभव की संरचना बदल जाए, तो हमारे लिए संसार का अर्थ भी बदल सकता है।

क्या अनेक realities वास्तव में अलग हैं? यहीं योगवासिष्ठ की दृष्टि और अधिक रोचक हो जाती है।

निर्वाणप्रकरण में एक स्थान पर कहा गया है—

कालः, जगन्ति, भुवनानि, अहम्, अक्षवर्गः, त्वम्, तानि, तत्र, च, तथा, इति, च सर्वम् एकम्।

 चित्-व्योमम्, शान्तम्, अजम्, अव्ययम्, ईश्वर-आत्म, रागादयः खलु न केचन संभवन्ति ॥ ८४ ॥

भाव यही है कि, समय है,जगत हैं,भुवन हैं, ‘मैं’ है, ‘तुम’ हो , और फिर भी सब उसी एक के अनेक प्रतिबिंब जैसे हैं।। यहीं अनेकता के पीछे एकता का प्रश्न सामने आता है।यदि अनुभव अनेक हैं, जगत अनेक हैं, समय के अनुभव अनेक हैं, तो क्या उनके पीछे कोई ऐसा आधार है जो स्वयं इन अनेकताओं से परे है?

वेदान्त का उत्तर इसी दिशा में जाता है, अनेक अनुभव हो सकते हैं, लेकिन अनुभव को प्रकाशित करने वाला चैतन्य मूलतः एक है। 

शायद समस्या reality के अनेक होने में नहीं है।समस्या यह है कि हम अपनी वर्तमान अनुभूत reality को ही सम्पूर्ण reality मान लेते हैं।  यहीं perception एक सीमा बन जाता है। क्योंकिReality, experience, perception और interpretation एक ही चीज नहीं हैं। 

और  यदि ऐसा है, तो शायद मुक्ति किसी दूसरी reality में जाने का नाम नहीं है। न किसी दूसरी dimension में प्रवेश करना। न इस संसार से भाग जाना। न किसी “parallel world” को खोज लेना।

कदाचित  मुक्ति का अर्थ यही है- जिस reality को हम सम्पूर्ण सत्य समझकर जी रहे हैं, उसके प्रति अपनी पकड़ को ढीला कर देना। दूसरों की दुनिया में प्रवेश करना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना कि हर व्यक्ति अपनी अनुभूति की एक अलग खिड़की से जीवन देख रहा है। जगत को छोड़ना नहीं, बल्कि उसके प्रति अपनी आसक्ति और निश्चितताओं को देखना। और शायद सबसे महत्वपूर्ण, अपने अनुभव को देखने वाले “मैं” को समझना ।

और शायद ज्ञान का उद्देश्य भी हमें किसी अंतिम उत्तर से भर देना नहीं, बल्कि देखने की हमारी संभावनाओं को खोलना है- सूचना से बोध की ओर, निष्कर्ष से एक सहज, सजग साक्षी-भाव की ओर।


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