कर्ता से द्रष्टा - स्वभावतः भ्रमित मन का अपरिहार्य आत्मावलोकन
जीवन में अक्सर हमारे सामने कुछ ऐसी जिम्मेदारियाँ आ जाती हैं जिन्हें हमें निभाना होता है—चाहे वे परिवार की हों, दैनंदिन कामकाज की हों या हमारे अपने लक्ष्यों और सपनों की। कई बार हम स्वयं भी कुछ जिम्मेदारियाँ आगे बढ़कर स्वीकार कर लेते हैं। परिस्थितियाँ कठिन होती हैं, संसाधन सीमित होते हैं, फिर भी हम किसी तरह उन्हें निभा पाते हैं और कई बार अपेक्षा से बेहतर भी कर जाते हैं।
पीछे मुड़कर देखने पर हम अक्सर इसका श्रेय स्वयं को देते हैं—
“मैं साहसी था।”
“मैं सक्षम था।”
“मैंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया।”
“मैंने सब संभाल लिया।”
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही था? थोड़ा गहराई से, थोड़ा रुककर विचार करें तो एक दूसरा दृष्टिकोण भी सामने आ सकता है।
हमारे आसपास हमेशा हमसे अधिक प्रतिभाशाली, बुद्धिमान, योग्य और संसाधन-संपन्न अनेक लोग रहे हैं। ईश्वर चाहता तो उन्हें हमसे कहीं अधिक सक्षम बनाकर उसी भूमिका के लिए चुन सकता था। फिर हमें ही वह अवसर और जिम्मेदारी क्यों मिली? शायद इसका उत्तर हमारी योग्यता से कहीं बड़ा है।
संभव है कि हम बस उस विशेष परिस्थिति में उपस्थित थे, जहाँ जीवन ने हमारे सामने एक जिम्मेदारी रख दी और हमने उसे स्वीकार कर लिया, या बहुत संभव है कि नियति ने हमें उसी जिम्मेदारी के लिए साधन-संपन्न किया हो, आवश्यक सामर्थ्य, संसाधन, अवसर और परिस्थितियाँ देकर, और अपने आशीर्वाद को हमारी जिम्मेदारियों के भीतर ही छिपा दिया हो।
तब जिस चीज़ को हम केवल अपनी योग्यता, अपनी क्षमता और अपना कर्तव्य समझ रहे थे, संभव है वह वास्तव में ईश्वर की कृपा का एक रूप रही हो।
जिस जिम्मेदारी को हम कभी बोझ समझकर उठा रहे थे, संभव है उसी के भीतर हमारे लिए आवश्यक शक्ति, अनुभव और विकास का बीज छिपा हुआ था। शायद ईश्वर ने हमें इसलिए नहीं चुना कि हम सबसे योग्य थे; शायद जिम्मेदारी देकर ही ईश्वर ने हमें योग्य और सक्षम बनाया।
हमें कुछ साधन मिले।कुछ अवसर मिले।कुछ सही लोग हमारे जीवन में आए।किसी ने समय पर हमारा साथ दिया।
किसी ने सही सलाह दी।कभी परिस्थितियाँ हमारे पक्ष में रहीं।और कभी-कभी हमारी अपनी क्षमता से कहीं अधिक धैर्य हमारे भीतर अचानक उत्पन्न हो गया।
कभी-कभी हम स्वयं आश्चर्य करते हैं, “मुझमें इतनी ताकत आई कहाँ से?”
जिस व्यक्ति को कल तक लगता था कि वह यह सब संभाल नहीं पाएगा, वही आज वर्षों से उसे संभाल रहा होता है।
और यहीं से आत्मावलोकन का एक सुंदर द्वार खुलता है कि जिस क्षमता पर हमें गर्व था, वह भी पूरी तरह हमारी बनाई हुई नहीं थी। हमने अपनी बुद्धि स्वयं नहीं बनाई। अपनी परिस्थितियाँ, अपना परिवार, अपने अवसर और जीवन में मिलने वाले अनेक लोगों को हमने स्वयं नहीं चुना। यहाँ तक कि कठिन समय में टिके रहने की मानसिक शक्ति भी हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होती। फिर भी हम इन सबका श्रेय एक छोटे-से शब्द को दे देते हैं—
“मैं।”
यही शायद मन का सबसे स्वाभाविक भ्रम है।
“मैंने किया।”“मैंने संभाला।”“मैं सक्षम था।”लेकिन थोड़ा और पीछे हटकर देखने पर शायद वाक्य बदलने लगता है; “मुझसे यह हुआ।” “मुझे इसे करने योग्य बनाया गया।”और शायद यहीं से कर्ता भाव में पहली दरार पड़ती है।
कृपा का अर्थ यह आवश्यक नहीं कि कोई अदृश्य शक्ति हमारी कठिनाइयों को समाप्त कर दे। शायद कृपा का अर्थ यह है कि कठिनाइयाँ बनी रहती हैं, लेकिन उन्हें पार करने के लिए आवश्यक शक्ति, व्यक्ति, अवसर, विचार और धैर्य किसी न किसी रूप में हमारे जीवन में आते रहते हैं।
ईश्वर शायद हमेशा हमारे लिए रास्ता नहीं बनाता; कभी-कभी वह हमें उस रास्ते पर चलने योग्य बना देता है।
और संभव है कि हमारी कई जिम्मेदारियाँ वास्तव में उसी कृपा का माध्यम रही हों।हम सोचते हैं कि हम जीवन को संभाल रहे हैं।लेकिन शायद किसी गहरे स्तर पर जीवन ही हमें संभाल रहा होता है। यह विचार हमारी उपलब्धियों को छोटा नहीं करता; बल्कि उन्हें और अधिक अर्थपूर्ण बना देता है।
क्योंकि तब सफलता अहंकार का कारण नहीं, कृतज्ञता का कारण बनती है।
शायद ईश्वर हमेशा असाधारण लोगों को ही असाधारण जिम्मेदारियाँ नहीं देता। शायद वह सामान्य मनुष्यों को परिस्थितियों के बीच रखता है और फिर उन्हीं परिस्थितियों के अनुरूप उन्हें धीरे-धीरे सक्षम भी बनाता है।
और जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो समझ आता है कि जिस यात्रा में हमें लगता था कि हम अकेले आगे बढ़ रहे थे, वहाँ अनगिनत दिखाई और अदृश्य हाथ हमारे साथ थे। शायद हम उतने सक्षम नहीं थे जितना हमने स्वयं को समझ लिया था। शायद हम केवल उतने ही सक्षम बनाए गए थे, जितना उस क्षण जीवन को हमसे चाहिए था।
और शायद इससे भी गहरी बात यह है कि जिन जिम्मेदारियों को हम अपना समझकर निभाते रहे, उनमें ही दैव ने हमारे लिए अपना आशीर्वाद छिपा रखा था।
यहीं से जीवन को देखने का एक और आयाम खुलता है। जब तक हम स्वयं को हर घटना का पूर्ण कर्ता मानते हैं, तब तक उपलब्धि में अहंकार और असफलता में निराशा स्वाभाविक है।
लेकिन जब हम थोड़ा पीछे हटकर देखते हैं, तो दिखाई देता है कि हमारे जीवन में कितना कुछ हमारे नियंत्रण से बाहर था; हमारी परिस्थितियाँ, हमारे अवसर, हमारे संबंध, हमारी क्षमताएँ और वे अनगिनत घटनाएँ जिन्होंने हमें उस व्यक्ति में ढाला जो हम आज हैं।
तब कर्ताभाव धीरे-धीरे साक्षीभाव में बदलने लगता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हम कर्म करना छोड़ दें या अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएँ। बल्कि इसका अर्थ है कि हम कर्म करते हुए भी अपने अहंकारपूर्ण कर्ताभाव को थोड़ा ढीला कर दें।
प्रश्न बदल जाता है। “मैंने क्या किया?”से“मेरे माध्यम से क्या-क्या घटित हुआ?”यही शायद कर्ता से द्रष्टा की यात्रा है।
कर्ता कर्म करता है; द्रष्टा कर्म को घटित होते हुए भी देखता है।कर्ता उपलब्धि को अपना मानता है;द्रष्टा उसमें मिले अनगिनत सहयोग और कृपा को देख पाता है , यह देख पाना भी एक दैवीय अनुकंपा है ।
कर्ता कहता है,“मैंने किया।” द्रष्टा धीरे से पूछता है, “क्या वास्तव में केवल तुमने ही किया?”
और शायद यही प्रश्न मन के उस भ्रम को धीरे-धीरे खोलता है, जिसे हम जीवन भर अपना सत्य समझते रहे।
अंततः उपलब्धियों का सबसे परिपक्व उत्तर शायद गर्व नहीं, कृतज्ञता है।“मैंने किया” से “मुझसे करवाया गया” तक की यात्रा ही शायद कर्ता से द्रष्टा की यात्रा है।
और अंततः-हम सोचते रहे कि हम जीवन को संभाल रहे हैं; जबकि संभव है, इतने वर्षों से जीवन ही हमें संभाल रहा हो।
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