अच्छा लगता है
पूर्ण, निर्दोष या उत्तम,
ना सही, मगर
अच्छा लगता है कि
जैसे कोई रास्ता भटके
और उसे रास्ता न मिले,
कोई दूसरा भटका राही मिले।
भटकाव से जीवन में तुम
मेरी वही संगिनी हो।
अच्छा लगता है कि
जैसे बच्चे के पास
हो कोई कॉपी
या बस कोई खाली दीवार,
और मिल जाए उसे पेन, पेंसिल,
क्रेयॉन या माँ की लिपस्टिक भी।
तुम मेरे जीवन के कैनवास
की वही तूलिका हो।
कि अच्छा लगता है,
रातों के बाद भोर का आना,
मेरे घर के पूरब की बालकनी में
सूरज की रोशनी के साथ चहचहाती
छोटी गौरैया और सारिका (मैना) हो तुम।
एकदम आदर्श नहीं,
मगर अच्छा लगता है।
जैसे किसी को उसकी बदमाशियों में
कोई साथी मिल जाए,
बीतते लम्हों से जीवन की चोरी में
तुम मेरी वामस्थिता,
वामांगी, मेरी सहधर्मिणी हो।
कि मुझे ये सब,पर्याप्त है |
और अच्छा लगता है, बस जैसा का तैसा |
बहुत ही सुंदर रचना प्रिय...क्या कहने, अद्भुत...👌👌👌
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