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Showing posts from 2026

सिद्धार्थ

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प्रिय छोटे मित्र सिद्धार्थ, तुम हमारी अगली पीढ़ी के बड़े बच्चों में से हो। तुम्हारे तैयार होते कंधों पर अदृश्य किन्तु गहरी ज़िम्मेदारियाँ धीरे-धीरे आकार लेंगी। तुम्हारे जन्मदिन पर पूर्ण हृदय से आशीष है| कि तुम्हें मिले एक पूर्ण जीवन। भावनाओं और अनुभूतियों के स्तर पर तुम्हें जीवन की त्रिकोणमिति से  sin और cosine  मिले। तुम्हारा साहस और धैर्य logarithm सा हो धीरे-धीरे बढ़ता हुआ, पर स्थायी और स्थिर। तुम्हारी प्रगति tan की तरह ऊर्ध्वगामी हो, पर विवेक की धुरी पर टिकी हुई। समय के x-axis पर जन्म के शून्य से आगे बढ़ते हुए, तुम लोगों के साथ रहो 1/log x के ग्राफ की तरह, जितना आगे बढ़ो, उतने ही विनम्र, उतना ही ज़मीन से जुड़े हुए। मैं तुम्हारे जीवन में कोई mod function नहीं चाहता जो अनुभवों को केवल सकारात्मकता तक सीमित कर दे। जीवन तुम्हें पूरा मिले, सुख भी, दुख भी, चुनौतियाँ भी, उपलब्धियाँ भी। बस एक आशीष है, तुम जुड़े रहो जमीन से, बनो संवेदनशील और अर्थपूर्ण। तुम्हारी उपस्थिति औरों को साहस दे। और तुम स्वयं, इस जीवन के एक  “सिद्ध अर्थ” बन जाओ | जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ...

अच्छा लगता है

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पूर्ण, निर्दोष या उत्तम, ना सही, मगर  अच्छा लगता है कि जैसे कोई रास्ता भटके और उसे रास्ता न मिले, कोई दूसरा भटका राही मिले। भटकाव से जीवन में तुम मेरी वही संगिनी हो। अच्छा लगता है कि जैसे बच्चे के पास हो कोई कॉपी या बस कोई खाली दीवार, और मिल जाए उसे पेन, पेंसिल, क्रेयॉन या माँ की लिपस्टिक भी। तुम मेरे जीवन के कैनवास की वही तूलिका हो। कि अच्छा लगता है, रातों के बाद भोर का आना, मेरे घर के पूरब की बालकनी में सूरज की रोशनी के साथ चहचहाती छोटी गौरैया और सारिका (मैना) हो तुम। एकदम आदर्श नहीं, मगर अच्छा लगता है। जैसे किसी को उसकी बदमाशियों में कोई साथी मिल जाए, बीतते लम्हों से जीवन की चोरी में तुम मेरी वामस्थिता, वामांगी, मेरी सहधर्मिणी हो। कि मुझे ये सब,पर्याप्त है | और अच्छा लगता है, बस जैसा का तैसा |

When the Gods of Heaven Burned to Ashes-I

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" This essay is not an attack on faith, but an exploration of its evolution. It moves from moral protest to metaphysical dissolution. Read slowly" If evil exists, and the devil too, and if God exists, then evil cannot stand outside His will, because nothing can. If that is so, then on the grounds of intent and rationality, and without any trace of hypocrisy, I find myself placing human beings far superior to God in moral courage. For a human being, though flawed and fragile, still wrestles with the devil within and resists the darkness in the outer world. This is not rebellion. It is moral inquiry, the refusal to silence a question merely because tradition has grown comfortable with its absence, and a rejection of the blind conditioning that turns learners into schooled parrots. At the level of lived experience, this idea is relatable. Yet it is difficult to accept, for centuries of societal institutionalisation, almost perennially chronic, have conditioned us to ...

"जब स्वर्ग के देवता राख हो गए -1"

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" यह निबंध आस्था पर आक्रमण नहीं, बल्कि उसकी अंतःयात्रा की दार्शनिक परिणति है। यह नैतिक प्रतिरोध के बोझ से चलकर अध्यात्म के धरातल पर अस्तित्व की शून्यता  जनित भारहीनता में प्रवेश करता है। इसे शीघ्रता में नहीं, सजगता में पढ़ें।" यदि बुराई है, और शैतान भी है, और यदि ईश्वर है, तो बुराई उसकी इच्छा से बाहर नहीं हो सकती, क्योंकि कुछ भी उसकी इच्छा से बाहर नहीं हो सकता। यदि ऐसा है, तो उद्देश्य और तर्क की दृष्टि से, और बिना किसी पाखंड के, मैं मनुष्य को नैतिक साहस में ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानता हूँ। क्योंकि मनुष्य, अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं के बावजूद, अपने भीतर के शैतान से जूझता तो है और बाहरी अंधकार का भी यथाशक्ति प्रतिरोध करता है। यह मेरा विद्रोह नहीं है। यह नैतिक जिज्ञासा है, उस प्रश्न को दबाने से इनकार जो केवल इसलिए असुविधाजनक बना दिया गया है क्योंकि यह समाज और हमारी परंपरा ऐसे प्रश्नों की अनुपस्थिति में सहज हो चुकी है। यह उस अंधी स्वीकृति का भी निषेध है, जो हमें अंधविश्वास के पिंजरे का तोता बना देता है। जीवन में अनुभव के धरातल पर यह विचार या द्वंद्व सहज अनुभूत हो सकता है...

PSU- A Bullock Carts in a Modern Race

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Many PSUs today feel like bullock carts in a competitive race. The cart is driven by jockeys called heads, while bullocks, donkeys, horses and even elephants, our employees, are tied to the same yoke. Different strengths and different capacities, yet the same pace and the same race. Everyone has a reason for non performance, process gaps, legacy systems, finance, vigilance, approvals, manpower, rarely oneself. There is clarity of task but no clarity of purpose. Files move and procedures comply, but horses are restrained, elephants are underused, donkeys survive through inertia, and leadership manages reins instead of unlocking potential.The cart moves, but movement is mistaken for progress. PSUs do not lack capable people, they lack aligned purpose, trust in intent, and processes that reward ownership over obedience Until the race is redefined and people are allowed to run as they are built to, the bullock cart will keep creaking forward, wondering why it never wins....

अपूर्ण में पूर्ण

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अनिश्चितता और अधूरेपन के भीतर अक्सर वही बीज छुपा होता है, जिसे हम संभावना कहते हैं; कुछ वैसा ही, जैसा स्वयं जीवन है। जो कुछ भी पहले से तय और पूर्ण मान लिया जाता है, वहाँ आगे बढ़ने की गुंजाइश लगभग शून्य हो जाती है। हार अपने भीतर नए द्वार समेटे रहती है, जबकि जीत के साथ कहीं न कहीं अहंकार की एक मौन छाया भी चल पड़ती है। खुशियाँ और विजय जितनी सहजता से सार्वजनिक हो जाती हैं, दुःख और पराजय उतनी ही खामोशी से निजी रह जाती हैं। कर्म की अपनी-अपनी व्याख्याएँ हो सकती हैं, पर अधूरेपन, संघर्ष और ठहराव को स्वीकार करना भी एक सचेत वरण है; इसलिए नहीं कि मृत्यु का भय नहीं, बल्कि इसलिए कि संभावनाओं की साधना ही जीवन का सबसे आत्मीय चयन है। यहाँ प्रयास बना रहता है, बस परिणाम के आग्रह की आवाज़ धीमी पड़ जाती है।