Wednesday, November 14, 2012

तुमसे से मिलने की आस है बाकी

 तुमसे से  मिलने की आस है बाकी ,
वरना तो हम इस  ज़िन्दगी से डरते हैं ;
तुम ही क्यों  समझ नहीं पाई ,
की हम तो बस तुम ही पे मरते हैं

कल रात थी दिवाली की सो ,
मुबारक हो तुमको वो दीपक औ बाती ;
वो बिजली-जुगनू और चाँद -सितारे ,
हम तो अब रौशनी से डरते हैं ,

साँस कुछ और बाकी  है मेरे खाते में  ,
वरना अब तो बस कुछ यादें हैं, जो की आती-जाती हैं ;
 तुमसे से  मिलने की आस है बाकी ,
वरना तो हम ज़िन्दगी से डरते हैं ;


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