Wednesday, September 5, 2012

मैं आज शायद कमज़ोर पड़ने लगा हूँ

तेरा बस नशा है ,    तेरी ही खुमारी ,
 खो गए मेरे  दिन हैं और हुईं रातें खाली ,
मैं थक भी गया हूँ  अब रोंने चला  हूँ '
दीवारें ना देखें की कमज़ोर, मैं हो गया हूँ ;

इस डर से अब ख़ुद में ही , मैं घुलने लगा हूँ ,
ग़र मैं कभी टूट जाऊं तभी तुम भी आना ;
तुम्हे बस कुछ मालाएँ मिलेंगीं ,
मैं आंसुओं से  मोती पिरोने लगा हूँ ;

दीवारें ना देखें  की कमज़ोर मैं हो गया हूँ...
धुआं भी है छाया और पड़ा  ज़ाम खाली;
 खुद अपना साक़ी   ,मैं बनने चला हूँ ,
 मैंअब तो सोते हुए, तेरा नाम लेने लगा हूँ ;

दीवारें न सुन लें कि अब कौन मेरा
 बिस्मिल बनने लगा है सो अब मैं भी छुप के ;
मोतियों पर,  तेरा नाम लिखने लगा हूँ,
शायद  मैं अबतक कमज़ोर पड़ने लगा हूँ ।

 ग़र मैं कभी टूट जाऊं तभी तुम भी आना ,
तुझे तेरा नाम फिर भी संवारा मिलेगा ;
बात ये दीगर है की कोई दीवाना तेरा तुझको ,
वहाँ बिखरा  मिलेगा ;
  तुम गम ना करना तुम हो आज सुन्दर
और भी तुमको कई लोग,मिलेंगे
मगर जब ना हो कोई पास तेरे ,
तु बस एक बार मेरा नाम लेना ,
एक बिखरा हुआ बुत तुझे तेरे पीछे
सवंरता  मिलेगा  ,नींद से उठते ही कोई ,
तुझको तेरा नाम लेता मिलेगा ;;;;;;;;;;




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